Friday, August 31, 2007

जल उठा मोहब्बत का शहर

मोहब्बत की मिसाल को को कलेजे में लगाये बैठा शहर जल उठा। उस नजारे को जब हमने आपने टेलीवीजन सेट पर देखा दो कलेजा कांप गया। वो शब्बेरात की रुहानी नशा था। जब आगरा का आम शख्स अपने पुरखों को उनकी मजार पर रोशनी कर ढूंढ रहा था। तभी चार लोग हादसे का शिकार हो गये। रफ्तार से आते ट्रक ने चार लोगों को मौत की नींद सुला दिया। फिर क्या था पहले हंगामा बरपा। फिर आग लगी। पत्थर बरपे। इंसान अचानक शैतान बन गया। सूरज की रोशनी को दंगे, धुंयें और गुब्बार ने ढंक लिया। दिन चढते चढ़ते बवाल और बढ़ा। पुलिस कुछ और बेवस हुई। लाठी डंडों से बात नही बनी तो हवा में गोली चला दी। बवाल आग की तरह फैला। एक इलाके से होता हुआ दूसरे इलाके को अपने चपेट में ले लिया। नतीजा आगरा शहर के छह थाना क्षेत्रों में कार्फ्यू लगाना पड़ा। लेकिन इस घटना के बाद अब तक कई बड़े सवाल पनप चुके थे। क्या हादसे बता कर होते हैं ... यकीन से कहा जा सकता है नहीं। लेकिन हादसों के बाद जो मंजर बना क्या उसे भी हादसा माना जा सकता है। ये सवाल उस भरोसे को हिलाता है जिस भरोसे के साथ शब्बेरात के मौके पर बैखौफ अपनी पुरखों की मजार पर जाते हैं। सवाल उठता है कि जो लोग रूहानियत का एहसास लिए थे अचानक हैवानियत का मंजर कैसे खड़ा कर सकते हैं। अब इस बात पर बहस हो चली है कि जाने अंजाने हमारे आपके बीच कुछ ऐसे लोग जगह बना चुके हैं जो दरअसल हमारे आपके जैसे हैं नहीं। उनकी फितरत का अंदाजा लगाना मुश्किल है। वो बस ऐसे ही किसी हादसे का इंतजार करते हैं जब नफरत और बदले की आग को भड़काया जा सके। आगरा की घटना से कुछ दिन पहले कुछ कांवड़ियों की हादसों में मौत के बाद अलग अलग जगहों पर कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला बना। तब भी सार्वजनिक संपति को नुकसान पहुंचाया गया। नुकसान पहुंचाने वाले असली तत्व आज भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। । मक्का मस्जिद बम धमाके के बाद भी तनाव पनपने से ज्यादा भड़काया और उकसाया हुआ नजर आया। नंदीग्राम सिंगुर मामले में भी राज्य सरकार बाहरी तत्वों का हवाला देती नजर आयी। कुछ ऐसा ही नजारा गोहाना कांड में भी देखने को मिला। एक के बाद एक होते ये हादसे बता रहे हैं कि जिस काम को आतंकी.... धमाकों से पूरा नही कर पाये उसे कुछ ऐसे लोग योजनावद्ध तरीके से अंजाम दे रहे हैं। और बड़ी बड़ी एजेंसियां भी इनके बारे में कोई जानकारी नहीं ला पा रही हैं।

शेखर आनंद त्रिवेदी